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अरणी


अरणी
                    अरणी का परिचय



                    अरणी उत्तर भारत में विशेषतः गंगा के मैदानों तथा उत्तार प्रदेश, बिहार तथा पश्चिम बंगाल में पाया जाता है। कुमाऊ से भूटान तक पहाड़ियों में 5,000 फिट की ऊंचाई तक पाया जाता है।
                   दशमूल का उपादान होने से इसका मूल पंसारियों के यहां मिलता है, अतः इसे अग्निमंथ कहा गया है। अरणी की एक और जाति पाई जाती है, जिसे छोटी अरणी, तरकरी टेकार तथा कहते हैं। बड़ी अरणी की भी कई और प्रजातियां मिलती है।

अरणी के बाह्य-स्वरूप :-

                    बड़ी अरणी यह 25-30 फुट ऊँचा वृक्ष होता है। तने की छाल हल्के धूसर रंग की, पत्र अभिमुख, 2-6 इंच लम्बे, दोनों सिरों पर पतले प्रातः लम्बाग्र 5-6 जोड़ी शिराओं से युक्त होते हैं। सूखने पर ये काले पद जाते हैं और मसलने से इनमें से दुर्गंध आती हैं। अरणी पुष्प मंजरी 2-5 इंच व्यास की विभक्त, रोमश, पुष्प द्विओष्ठी, हरिताभ, श्वेत वर्ण की होती है।
                   अरणी फल गोलाकार, दबा हुआ करौंदे की तरह का बैंगनी और कला होता है। पुष्पागम अप्रैल -मई में तथा फलागम मई-जून में होता है। अरणी की पुरानी शाखाओं पर आमने-सामने मजबूत कांटे होते है।
                   छोटी अरणी इसका प्रसारणशील गुल्म या छोटा वृक्ष 10 फुट तक ऊँचा, पत्र अभिमुख, दंतुर, प्रायः दो इंच लम्बे चौड़े वक्षीय या शीर्षस्थ गुच्छों में स्वेत वर्ण के अत्यंत सुगंधित होते है तथा इसके फल अंडाकार, सूखने पर चार खण्डों में फट जाते हैं। पुष्पागम सितंबर से मार्च तक होता है



अरणी का विभिन्न भाषाओँ में नाम :-

हिंदी             :     अरनी, गनियार, अगेथू

अंग्रेजी          :     Creek Premna, Spinous Fire Brand Teak, Coastal Premna

संस्कृत         :     अग्निमंथ वृहत, कणिका, गणिकारिका

उर्दू                :     गरणी

उड़िया           :     भुतोबैरी, आगोबोथू

कन्नड़          :     अग्निमंथा

गुजराती       :    अरणी

पंजाबी         :     अगेथु, गानियार

तमिल         :     मुन्नइ, पारूमुन्नइ

तेलगु          :       गब्बूनेल्ली, कर्निका, नागुरा

बंगाली        :        गनिर, गानियारी

मलयालम   :       मुन्ना

नेपाली        :        गिनेरी

मराठी        :         नरवेल, अरन, अरणी



अरणी का धार्मिक महत्व :-

अरणी वृक्ष  के धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व इस प्रकार है, जो मनुष्य को अनेक प्रकार के रोग एवं समस्याओं से दूर रखने के लिए लाभदायक है।

अरणी  की लकड़ी का 6 अंगुल लम्बा टुकड़ा शुभ मुहूर्त में निकाल लें। इसे घर लाकर इस पर थोड़ा सा शुद्ध घी चुपड़ दें। अगरबत्ती का धुआं देकर किसी लाल कपड़े में बांधकर सप्तरंगी धागे से रसोईघर के आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्वी कोने में) में लटका दें। ऐसा करने से रसोई में समृद्धि बनी रहती है। वहाँ का भोजन स्वाद बनता है तथा उस स्थान पर बनने वाले भोजन को खाने वाले आरोग्य प्राप्त करते हैं।

अरणी  की लकड़ी को घी एवं शहद में भिगोकर दहन करने से उस घर में आनन्द होता है। जलने के पश्चात् बनने वाली राख को जल में प्रवाहित करें। यदि जल में प्रवाहित करने की सुविधा न हो तो इस राख को पीपल वृक्ष के नीचे डालें तथा ऊपर से थोड़ा शीतल जल डाल दें।

अरणी का ज्योतिषीय महत्व :-
                     अरणी  की लकड़ी को पास में रखने वाले की चन्द्र पीड़ा समाप्त होती है।

अरणी का वास्तु में महत्व :-
                   घर की सीमा में अरणी का वृक्ष शुभ एवं फलदायी नहीं होता। इसलिये इस वृक्ष को घर में कभी न लगायें।


अरणी (अगेथू) के गुण, फायदे, नुकसान एवं औषधीय प्रयोग

अरणी अनेक रोगों की दवा जैसे:-



                 अरणी के औषधीय गुण-धर्म

अग्नि वर्धक, शोथ, कफ, वात तथा पांडुरोग हरने वाली यह कटु पौष्टिक, कफध्न, अनुलोमन तथा शीत-प्रशमन है।
मूल :- इसकी जड़ विरेचक, अग्निवर्धक तथा यकृत की पीड़ा को दूर करने वाली है।
छोटी अरणी :- छोटी अरणी कड़वी, चरपरी, उष्ण, मधुर तथा वात कफ, शोथ तथा पाण्डु हरने वाली है।
                     गंठिया, बुखार, बवासीर, अतिसार, उदर रोग, सूजन, रक्तशुद्धि, बद्धकोष्ठ, त्रिदोष गुल्म, शीतपित्त, उपदंश हृदय दौर्बल्य आदि बिमारियों के इलाज में अरणी के औषधीय चिकित्सा प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से किये जाते है:-

गंठिया :-
गठिया में अरणी के पंचांग का 100 मिलीलीटर काढ़ा सुबह-शाम पिलाने से गठिया और स्नायु की वात पीड़ा में लाभदायक होती है।

बुखार :-
ज्वर (बुखार) ठंठ लेकर जो बुखार आता है, उसमें अरणी जड़ को मस्तक पर बांधने या फिर लेप करने से बुखार शीघ्र उत्तर जाता है। अरणी के 10-15 पत्तों और 10 काली मिर्च को पीसकर सुबह-शाम सेवन करने से सर्दी का बुखार उत्तर जाता है।

बवासीर :-
बवासीर में अरणी के पत्तों का 100 मिलीलीटर क्वाथ पिलाने से तथा इसके पत्तों की पुल्टिस बनाकर बाँधने से बवासीर में लाभदायक होती है।

अतिसार :-
अतिसार (दस्त) में अरणी के पंचाग का क्वाथ 30 मिलीलीटर सुबह-शाम सेवन करने से दस्त में लाभ होता है तथा पेट के कीड़े मर जाते है।



उदर :-
उदर रोग (पेट रोग) में अरणी की 100 ग्राम जड़ को लेकर आधा किलो पानी में धीमी आंच पर 15 मिनट तक उबालें, तथा 100 ग्राम पानी दिन में दो बार पीने से पेट के विकार प्रबल होती है। अरणी के पत्तों का 100 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से पेट रोग ठीक हो जाते है तथा अफारा भी दूर होता है।

सूजन :-
सूजन में अरणी की जड़ का 100 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर सुबह-शाम सेवन करने पेट की पीड़ा, जलोदर और सभी प्रकार की सूजन मिटती है।
अरणी की जड़ और पुनर्नवा की जड़ दोनों को एक साथ पीसकर गर्म कर लेप करने से शरीर की सभी प्रकर की सूजन बिखर जाती है।

रक्तशुद्धि :-
रक्तशुद्धि (खून की अशुद्धिता दूर करने) में अरणी की जड़ का 100 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर सुबह-शाम 20 से 30 मिलीलीटर पीने से खून शुद्ध हो जाता है तथा हृदय बलपूरक हो जाता है। अरणी के पत्तों का स्वरस में मधु मिलाकर पिलाने से खून की अशुद्धिता दूर होती है।

बद्धकोष्ठ :-
बद्धकोष्ठ (कब्ज) में अरणी के पत्ते और हरड़ की पिपड़ी का 100 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर सुबह शाम 30 मिलीलीटर की मात्रा में पिलाने से कब्ज नष्ट हो जाती है।

त्रिदोष गुल्म :-
त्रिदोष गुल्म (पेट की गैस) में बड़ी या छोटी अरणी की जड़ को 100 मिलीलीटर गर्म क्वाथ में 30 ग्राम गुड़ मिला कर सेवन करने से पेट की गैस दूर हो जाती है।

शीतपित्त :-
शीतपित्त (पित्ती उछलना) अरणी की जड़ का 2 ग्राम चूर्ण एक सप्ताह घी के साथ सेवन करने से पित्ती मिटती है तथा उदर रोग भी मिटता है।

उपदंश :-
उपदंश में अरणी के पत्रों का 12 ग्राम या स्वरस सुबह-शाम पिलाने पुराना उपदंश मिटता है।

हृदय दुर्बलता :-
हृदय दौर्बल्य (हृदय की कमजोरी) में अरणी के पत्ते और धनिये का 60-70 मिलीलीटर काढ़ा पिलाने से हृदय की दुर्बलता मिटती है।


त्रिदोष (वात, कफऔरपित्त) गुल्म :-



बड़ी या छोटी अरनी की जड़ों के 100 मिलीलीटर गर्म काढ़े में 30 ग्राम गुड़ मिलाकर देने से त्रिदोष गुल्म दूर हो जाते हैं।
              बड़ी या छोटी अरनी के गर्म काढे़ को गुड़ डालकर पिलाना चाहिए। इससे वात, पित्त और कफ नष्ट हो जाता है।

पक्षाघात (लकवा) :-
प्रतिदिन काली अरनी की जड़ के तेल का लेप करके सेंकना चाहिए। इससे पक्षाघात, जोड़ों का दर्द और सूजन नष्ट हो जाती है।

अरनी की 100 ग्राम जड़ों को लेकर लगभग 470 मिलीलीटर पानी में धीमी आंच पर 15 मिनट तक उबालें। इसे 100 मिलीलीटर  की मात्रा में दिन में 2 बार पीने से पाचनशक्ति प्रबल होती है। यह औषधि पौष्टिक भी है।
अरनी के पत्तों का साग बनाकर खाने से पेट की बादी मिटती है।

स्तन में दूध की वृद्धि : -
                अरनी की सब्जी बनाकर प्रसूता महिलाओं को खिलाने से उनके स्तनों में दूध की वृद्धि होती है।

बाघ के काटने पर : -
                बड़ी अरनी के पत्तों को नमक के साथ पीसकर बांधना चाहिए। बाघ के काटने के घाव में लाभ मिलता है।

त्रिदोष (वात, कफ और पित्त) गुल्म :-
                बड़ी या छोटी अरनी की जड़ों के 100 मिलीलीटर गर्म काढ़े में 30 ग्राम गुड़ मिलाकर देने से त्रिदोष गुल्म दूर हो जाते हैं।
बड़ी या छोटी अरनी के गर्म काढे़ को गुड़ डालकर पिलाना चाहिए। इससे वात, पित्त और कफ नष्ट हो जाता है।

बच्चों के पेट के कीड़े : -
               छोटी अरनी के पत्तों का रस लगभग 40 मिलीलीटर की मात्रा में बच्चों को पिलाने से उसके पेट के कीडे़ नष्ट हो जाते हैं।

हस्ति प्रमेह : -
                अरनी की जड़ का 100 मिलीलीटर काढ़ा सुबह-शाम पिलाने से हस्ति प्रमेह मिटता है। इस काढ़े के पीने से वसामेह भी मिटता है।

जोड़ों का दर्द :-
                अरनी के पत्तों का काढ़ा बनाकर पिलाने से गठिया का दर्द ठीक होता है।
अरनी के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) का 100 मिलीलीटर काढ़ा सुबह-शाम पिलाने से गठिया और स्नायु की वात पीड़ा मिटती है।

अतिसार : -
              अरनी के पंचाग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) का काढ़ा 30 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने से अतिसार में लाभ होता है तथा पेट के कीड़े मर जाते हैं।

खून की सफाई के लिए :-
             अरनी की जड़ का काढ़ा 100 मिलीलीटर पीने से खून साफ होता है तथा हृदय शक्तिशाली होता है।
अरनी के पत्तों के रस में शहद मिलाकर पिलाने से भी खून की सफाई होती है।

बंद जुकाम :-
             अरनी के पत्तों को कालीमिर्च के साथ मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से सर्दी-जुकाम के रोग में लाभ होता है।

भगन्दर :-



            छोटी अरनी के पत्तों को जल द्वारा धुले मक्खन के साथ मिलाकर पीसकर इसका मिश्रण बनाएं। इस मिश्रण को भगन्दर पर पर लेप करने से अधिक लाभ होता है।
अग्निमंथ (अरनी) की जड़ को जल में उबालकर काढ़ा बनाकर इसके 15 मिलीलीटर काढ़े में 5 ग्राम शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से भगन्दर नष्ट होता है।

गिल्टी (ट्यूमर) :-
                      छोटी अरनी या बड़ी अरनी गर्म काढे़ में गुड़ मिलाकर सुबह-शाम पीने से गिल्टी जल्द ठीक होती है।

शीतपित्त : -
             बड़ी अरनी की जड़ को छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर 1 ग्राम चूर्ण, जीरे के 1 ग्राम चूर्ण के साथ शहद मिलाकर चाटकर खाने से शीतपित्त (पित्त उछलना) में बहुत लाभ होता है।

उपदंश (फिंरग) :-
               छोटी अरणी (अरनी) के पत्ते का रस 12 मिलीलीटर दिन में दो बार पीने से उपदंश मिट जाता है। अगर उपदंश पुराना हो तो भी दूर हो जायेगा।
अरनी के पत्तों का 12 मिलीलीटर या कुछ अधिक रस, दिन में दो बार कुछ दिनों तक पीने से फायदा होता है

अग्नि उत्पन्न करने में सहायक :-

                          अरणी की लकड़ी के तख्ते में एक छिछला छेद रहता है। इस छेद पर लकड़ी की छड़ी को मथनी की तरह वेग से नचाया जाता है। प्राचीन भारत में अग्नि उत्पन्न करने की इस विधि का प्रचलन था। छड़ी के टुकड़े को उत्तरा और तख्ते को अधरा कहा जाता था।
                        इस विधि से अग्नि उत्पन्न करना भारत के अतिरिक्त लंका, सुमात्रा, आस्ट्रेलिया और दक्षिणी अफ्रीका में भी प्रचलित था। उत्तरी अमेरीका के इंडियन तथा मध्य अमेरीका के निवासी भी यह विधि काम में लाते थे। एक वार चार्ल्स डार्विन ने टाहिटी (दक्षिणी प्रशांत महासागर का एक द्वीप जहाँ स्थानीय आदिवासी ही बसते हैं) में देखा कि वहाँ के निवासी इस प्रकार कुछ ही सेकंड में अग्नि उत्पन्न कर लेते हैं, यद्यपि स्वयं उसे इस काम में सफलता बहुत समय तक परिश्रम करने पर मिली।
                       फ़ारस के प्रसिद्ध ग्रंथ शाहनामा के अनुसार हुसेन ने एक भयंकर सर्पाकार राक्षसी से युद्ध किया और उसे मारने के लिए उन्होंने एक बड़ा पत्थर फेंका। वह पत्थर उस राक्षस को न लगकर एक चट्टान से टकराकर चूर हो गया और इस प्रकार सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न हुई।


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