चिरचिटा
चिरचिटा या अपामार्ग परिचय :-
चिरचिटा पेट की लटकती चर्बी गलाता है तो सड़े हुए दाँतो की खाँच को भर देता है, ये गठिया, आस्थमा, बवासीर, मोटापा, गंजापन, किडनी आदि के लिए किसी वरदान से कम नही है
आज हम आपको ऐसे पौधे के बारे में बताएँगे जिसका तना, पत्ती, बीज, फूल, और जड़ पौधे का हर हिस्सा औषधि है, इस पौधे को अपामार्ग या चिरचिटा कहते है। अपामार्ग या चिरचिटा का पौधा भारत के सभी सूखे क्षेत्रों में उत्पन्न होता है
यह गांवों में अधिक मिलता है खेतों के आसपास घास के साथ आमतौर पाया जाता है इसे बोलचाल की भाषा में आंधीझाड़ा या चिरचिटा भी कहते हैं-अपामार्ग की ऊंचाई लगभग 60 से 120 सेमी होती है
चिरचिटा के प्रकार:-
आमतौर पर लाल और सफेद दो प्रकार के अपामार्ग देखने को मिलते हैं-सफेद अपामार्ग के डंठल व पत्ते हरे रंग के, भूरे और सफेद रंग के दाग युक्त होते हैं इसके अलावा फल चपटे होते हैं जबकि लाल अपामार्ग का डंठल लाल रंग का और पत्तों पर लाल-लाल रंग के दाग होते हैं
इस पर बीज नुकीले कांटे के समान लगते है इसके फल चपटे और कुछ गोल होते हैं दोनों प्रकार के अपामार्ग के गुणों में समानता होती है फिर भी सफेद अपामार्ग श्रेष्ठ माना जाता है
इनके पत्ते गोलाई लिए हुए 1 से 5 इंच लंबे होते हैं चौड़ाई आधे इंच से ढाई इंच तक होती है- पुष्प मंजरी की लंबाई लगभग एक फुट होती है, जिस पर फूल लगते हैं, फल शीतकाल में लगते हैं और गर्मी में पककर सूख जाते हैं इनमें से चावल के दानों के समान बीज निकलते हैं इसका पौधा वर्षा ऋतु में पैदा होकर गर्मी में सूख जाता है।
अपामार्ग तीखा, कडुवा तथा प्रकृति में गर्म होता है। यह पाचनशक्तिवर्द्धक, दस्तावर (दस्त लाने वाला), रुचिकारक, दर्द-निवारक, विष, कृमि व पथरी नाशक, रक्तशोधक (खून को साफ करने वाला), बुखारनाशक, श्वास रोग नाशक, भूख को नियंत्रित करने वाला होता है तथा सुखपूर्वक प्रसव हेतु एवं गर्भधारण में उपयोगी है।
चिरचिटा के गुण – धर्म
रस – कटु, चरपरा |
गुण – लघु, रुक्ष एवं तीक्षण |
वीर्य – उष्ण |
विपाक – कटु |
इसको उत्तम वामक एवं दस्तावर औषधि माना जाता है | यह दीपन, रुचिकारक, कफनाशक, वात एवं हृदय रोग नाशक माना जाता है | इसका नस्य लेने से मष्तिष्क के कीड़े खत्म होते है | आयुर्वेद चिकित्सा में इसे नस्य, वमन, दाद, खाज-खुजली एवं रक्त शोधक माना जाता है |
रासायनिक संगठन
इसकी राख में विशेषत: पोटाश होता है | इसके अलावा चुना, लौह, क्षार आदि भी कुछ मात्रा में मिलते है | ये सभी तत्व इसकी जड़ की राख में सर्वाधिक पाए जाते है | पौधे की पतियों में भी मिलते है लेकिन इनका अनुपात जड़ की अपेक्षा कम होता है | बाजार में विभिन्न कम्पनियां इसके योग से अपामार्ग क्षार एवं तेल का निर्माण करती है | जिसका आयुर्वेद में चिकित्सकीय उपयोग किया जाता है |
चिरचिटा के विभिन्न नाम :-
• सफेद चिरचिटा : लटजीरा ,चिचड़ा ,अपामार्ग ,प्रत्यकपुष्पी ,अपंग ,अघेड़ो ,दतिवन ,कुत्री ,शिखरी ,मयूरक ,कटलटी आदि|
• लाल चिरचिटा : लाल चिचिड़ा ,वृंतफल ,वशिर ,उत्तरनी ,चिरुकटलाती ,परपल प्रिंसेस आदि|
अन्य भाषाओं में नाम संपादित करें
- संस्कृत-अपामार्ग
- मराठी-अघाडा
- बंगाली - आपांग
- गुजराती - अघेडो
- मलयालम - कडालाडी
- तमिल - नायरु
- तेलुगु - उत्तरेनिवि दुच्चीणिके
- अंग्रेजी - Rough Chaff Tree
- लैटिन - Achyranthis Aspera
चिरचिटा में उपस्थित पोषक तत्व :-
पोटाश क्षार ,लोहा ,नमक ,चूना ,गंधक ,बीटाइन ,एंचेटाईन आदि|
चिरचिटा या अपामार्ग के अद्भुत फ़ायदे :
गठिया रोग :-
अपामार्ग (चिचड़ा) के पत्ते को पीसकर, गर्म करके गठिया में बांधने से दर्द व सूजन दूर होती है।
पित्त की पथरी :-
पित्त की पथरी में चिरचिटा की जड़ आधा से 10 ग्राम कालीमिर्च के साथ या जड़ का काढ़ा कालीमिर्च के साथ 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से पूरा लाभ होता है। काढ़ा अगर गर्म-गर्म ही खायें तो लाभ होगा।
यकृत का बढ़ना :-
अपामार्ग का क्षार मठ्ठे के साथ एक चुटकी की मात्रा से बच्चे को देने से बच्चे की यकृत रोग के मिट जाते हैं।
लकवा :-
ग्राम कालीमिर्च के साथ चिरचिटा की जड़ को दूध में पीसकर नाक में टपकाने से लकवा या पक्षाघात ठीक हो जाता है।
पेट का बढ़ा होना या लटकना :-
चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ 5 ग्राम से लेकर 10 ग्राम या जड़ का काढ़ा 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम कालीमिर्च के साथ खाना खाने से पहले पीने से आमाशय का ढीलापन में कमी आकर पेट का आकार कम हो जाता है।
बवासीर :-
अपामार्ग की 6 पत्तियां, कालीमिर्च 5 पीस को जल के साथ पीस छानकर सुबह-शाम सेवन करने से बवासीर में लाभ हो जाता है और उसमें बहने वाला रक्त रुक जाता है।
खूनी बवासीर पर अपामार्ग की 10 से 20 ग्राम जड़ को चावल के पानी के साथ पीस-छानकर 2 चम्मच शहद मिलाकर पिलाना गुणकारी हैं।
मोटापा :-
अधिक भोजन करने के कारण जिनका वजन बढ़ रहा हो, उन्हें भूख कम करने के लिए अपामार्ग के बीजों को चावलों के समान भात या खीर बनाकर नियमित सेवन करना चाहिए। इसके प्रयोग से शरीर की चर्बी धीरे-धीरे घटने भी लगेगी।
कमजोरी :-
अपामार्ग के बीजों को भूनकर इसमें बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर पीस लें। 1 कप दूध के साथ 2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित सेवन करने से शरीर में पुष्टता आती है।
सिर में दर्द :-
अपामार्ग की जड़ को पानी में घिसकर बनाए लेप को मस्तक पर लगाने से सिर दर्द दूर होता है।
संतान प्राप्ति :-
अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में दूध के साथ मासिक-स्राव के बाद नियमित रूप से 21 दिन तक सेवन करने से गर्मधारण होता है। दूसरे प्रयोग के रूप में ताजे पत्तों के 2 चम्मच रस को 1 कप दूध के साथ मासिक-स्राव के बाद नियमित सेवन से भी गर्भ स्थिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
मलेरिया :-
अपामार्ग के पत्ते और कालीमिर्च बराबर की मात्रा में लेकर पीस लें, फिर इसमें थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर मटर के दानों के बराबर की गोलियां तैयार कर लें। जब मलेरिया फैल रहा हो, उन दिनों एक-एक गोली सुबह-शाम भोजन के बाद नियमित रूप से सेवन करने से इस ज्वर का शरीर पर आक्रमण नहीं होगा। इन गोलियों का दो-चार दिन सेवन पर्याप्त होता है।
गंजापन :-
सरसों के तेल में अपामार्ग के पत्तों को जलाकर मसल लें और मलहम बना लें। इसे गंजे स्थानों पर नियमित रूप से लेप करते रहने से पुन: बाल उगने की संभावना होगी।
दांतों का दर्द और गुहा या खाँच :-
इसके 2-3 पत्तों के रस में रूई का फोया बनाकर दांतों में लगाने से दांतों के दर्द में लाभ पहुंचता है तथा पुरानी से पुरानी गुहा या खाँच को भरने में मदद करता है।
खुजली :-
अपामार्ग के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फूल और फल) को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार करें और इससे स्नान करें। नियमित रूप से स्नान करते रहने से कुछ ही दिनों cavity में खुजली दूर जाएगी।
आधाशीशी या आधे सिर में दर्द : -
इसके बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से ही आधाशीशी, मस्तक की जड़ता में आराम मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अंदर जमा हुआ कफ पतला होकर नाक के द्वारा निकल जाता है और वहां पर पैदा हुए कीड़े भी झड़ जाते हैं।
ब्रोंकाइटिस : -
जीर्ण कफ विकारों और वायु प्रणाली दोषों में अपामार्ग (चिरचिटा) की क्षार, पिप्पली, अतीस, कुपील, घी और शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से वायु प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) में पूर्ण लाभ मिलता है।
खांसी : -
- खांसी बार-बार परेशान करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लेसदार हो गया हो, इस अवस्था में या न्यूमोनिया की अवस्था में आधा ग्राम अपामार्ग क्षार व आधा ग्राम शर्करा दोनों को 30 मिलीलीटर गर्म पानी में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से 7 दिन में बहुत ही लाभ होता है।
- लगभग 125 मिग्रा अपामार्ग क्षार में मधु मिलाएं। इसे सुबह और शाम चटाने से बच्चों की श्वास नली तथा वक्ष स्थल में जमा कफ दूर होता है। बच्चों की खांसी ठीक होती है।
- खांसी बार-बार परेशान करती हो और कफ निकलने में कष्ट हो साथ ही कफ गाढ़ा हो गया हो तो अपामार्ग का इस्तेमाल अच्छा परिणाम देता है। इस अवस्था में या न्यूमोनिया की अवस्था में 125-250 मिग्रा अपामार्ग क्षार और 125-250 मिग्रा चीनी को 50 मिली गुनगुने जल में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से 7 दिन में लाभ हो जाता है।
- 6 मिली अपामार्ग की जड़ का चूर्ण और 7 काली मिर्च चूर्ण को मिलाएं। सुबह-शाम ताजे जल के साथ सेवन करने से खांसी में लाभ होता है।
- अपामार्ग पञ्चाङ्ग की भस्म बनाएं। 500 मिग्रा भस्म में शहद मिलाकर सेवन करने से कुक्कुर खांसी ठीक होती है।
- बलगम वाली खासी को ठीक करने के लिए अपामार्ग की की जड़ चमत्कारिक रूप से काम करता है। इसके 8-10 सूखे पत्तों को हुक्के में रखकर पीने से खांसी ठीक हो जाती है।
गुर्दे का दर्द : -
अपामार्ग (चिरचिटा) की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में घोलकर पिलाने से बड़ा लाभ होता है। यह औषधि मूत्राशय की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। गुर्दे के दर्द के लिए यह प्रधान औषधि है।
गुर्दे के रोग :-
5 ग्राम से 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ का काढ़ा 1 से 50 ग्राम सुबह-शाम मुलेठी, गोखरू और पाठा के साथ खाने से गुर्दे की पथरी खत्म हो जाती है । या 2 ग्राम अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को पानी के साथ पीस लें। इसे प्रतिदिन पानी के साथ सुबह-शाम पीने से पथरी रोग ठीक होता है।
दमा या अस्थमा :-
चिरचिटा की जड़ को किसी लकड़ी की सहायता से खोद लेना चाहिए। ध्यान रहे कि जड़ में लोहा नहीं छूना चाहिए। इसे सुखाकर पीस लेते हैं। यह चूर्ण लगभग एक ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ खाएं इससे श्वास रोग दूर हो जाता है।अपामार्ग (चिरचिटा) का क्षार 0.24 ग्राम की मात्रा में पान में रखकर खाने अथवा 1 ग्राम शहद में मिलाकर चाटने से छाती पर जमा कफ छूटकर श्वास रोग नष्ट हो जाता है।
विषैले जीवों के काटने पर :-
- जानवरों के काटने व सांप, बिच्छू, जहरीले कीड़ों के काटे स्थान पर अपामार्ग के पत्तों का ताजा रस लगाने और पत्तों का रस 2 चम्मच की मात्रा में 2 बार पिलाने से विष का असर तुरन्त घट जाता है और जलन, दर्द में आराम मिलता है। पत्तों की पिसी हुई लुगदी को दंश के स्थान पर पट्टी से बांध देने से सूजन नहीं आती और वेदना दूर हो जाती है। सूजन चढ़ चुकी हो, तो शीघ्र ही उतर जाती है।
- इसकी पत्तियों को पीसकर बिच्छू काटे स्थान पर लगाने से बिच्छू का विष उतर जाता है | या इसकी पत्तियों को जलाकर बिच्छू काटने की जगह पर धूआं दिखा दिया जाए तो बिच्छू का जहर बहुत जल्दी उतर जाता है |
आंखों की बीमारी में लाभदायक अपामार्ग का प्रयोग :-
2 ग्राम अपामार्ग की जड़ के रस में 2 चम्मच मधु मिलाएं। इसे 2-2 बूंद आंख में डालने से आंखों के रोग ठीक होते हैं।
आई-फ्लू, आंखों में होने वाला दर्द, आंख से पानी बहने, आंखें लाल होना, रतौंधी आदि विकारों में अपामार्ग का प्रयोग करना उत्तम परिणाम देता है। अपामार्ग की साफ जड़ को साफ थोड़ा-सा सेंधा नमक मिले हुए दही के पानी के साथ घिसें। ध्यान रखना है कि तांबे के बर्तन में घिसें। इसे काजल की तरह लगाने से इन रोगों में लाभ होता है।
कटने-छिलने पर तुरंत रक्तस्राव को रोकता है अपामार्ग :-
अपामार्ग के 2-3 पत्तों को हाथ से मसलकर या कूटकर रस निकाल लें। उसके रस को कटने या छिलने वाले लगाने पर खून का बहना रुक जाता है।
अपामार्ग की जड़ को तिल के तेल में पकाकर छान लें। इसे कटने या छिलने वाले जगह पर लगाएं। आराम मिलता है।
घाव को सुखाने के लिए :-
- पुराने घाव में अपामार्ग रस के मलहम लगाएं तो घाव पकने नहीं है।
- अपामार्ग की जड़ को तिल के तेल में पकाकर छान लें। इसे घाव पर लगाएं। इससे घाव का दर्द कम हो जाता है और घाव ठीक हो जाता है।
- लगभग 50 ग्राम अपामार्ग बीज में चौथाई भाग मधु मिलाएं। इसमें 50 ग्राम घी में अच्छी तरह पकायें। पकाने के बाद ठंडा करके घाव पर लेप करें। इससे घाव तुरंत ठीक हो जाता है। इसके अलावा जड़ का काढ़ा बनाकर घाव को धोने से भी घाव ठोक हो जाता है।
रसौली का इलाज :-
अपामार्ग के लगभग 10 ग्राम ताजे पत्ते एवं 5 ग्राम हरी दूब को पीस लें। इसे 60 मिली जल में मिलाकर छान लें। इसे गाय के दूध में 20 मिली या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर सुबह सात दिन तक पिलाएं। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित रूप से करें। इससे गर्भाशय में गांठ की परेशानी ठीक हो जाती है।
प्रसव को आसान बनाने के लिए अपामार्ग
फायदेमंद:-
- आप प्रसव के समय भी अपामार्ग का उपयोग कर सकती हैं। पाठा, कलिहारी, अडूसा, अपामार्ग में से किसी एक औषधि की जड़ को नाभि, योनि पर लेप के रूप में लगाएं। इससे प्रसव आसानी से हो जाता है।
- प्रसव पीड़ा शुरू होने से पहले अपामार्ग की जड़ को एक धागे में कमर पर बांधें। इससे प्रसव आसानी से होता है। ध्यान रखना है कि प्रसव होते ही उसे तुरन्त हटा लेना चाहिए।
- अपामार्ग की जड़, पत्ते एवं शाखाओं को पीस लें। इसे योनि में लेप करने से सुखपूर्वक प्रसव होता है।
- अपामार्ग फूलों का पेस्ट बनाकर सेवन करने से प्रजनन से जुड़े रोगों में लाभ होता है।
रक्तप्रदर या योनि से अधिक रक्तस्राव होने पर अपामार्ग से फायदा :-
- अपामार्ग के लगभग 10 ग्राम ताजे पत्ते एवं 5 ग्राम हरी दूब को पीस लें। इसे 60 मिली जल में मिलाकर छान लें। इसे गाय के दूध में 20 मिली या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर सुबह सात दिन तक पिलाने से मासिक धर्म के दौरान अधिक खून बहने की परेशानी ठीक होती है। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित रूप से करें।
- अपामार्ग पञ्चाङ्ग रस में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव ठीक होता है।
- अपामार्ग पत्ते के रस से सिर का अभिषेक करें या पत्ते के रस को योनि में लेप करने से रक्तप्रदर (अधिक रक्तस्राव) में शीघ्र लाभ होता है।
- ल्यूकोरिया में अपामार्ग के प्रयोग से लाभ :-
- अपामार्ग पञ्चाङ्ग रस में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से ल्यूकोरिया ठीक होता है।
चिरचिटा (अपामार्ग) के नुकसान :-
- जैसा कि हम जानते है हर प्रकार का औषधीय पौधा केवल हमें लाभ ही पहुंचता है लेकिन ऐसा तभी होता है जब हम इसकी सही मात्रा लेते है और इसका सेवन डॉक्टर की सलाह से करते है|
- परंतु यदि हम ऐसा नहीं करते है तो चिरचिटा के नुकसान भी हमारे सामने आते है जैसे –
- इसका ज्यादा मात्रा में सेवन करने पर उल्टियाँ होने लगती है|
- स्तनपान करने वाली महिलाएं अगर इसका सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना करती है तो उनके लिए ऐसा करना नुकसानदायक हो सकता है|
- गर्भवती महिलाओं को तो इसका सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए|
अगर हमारे द्वारा दी गई जानकारी आपको पसंद आए तो इसे अपने दोस्तों के साथ जरुर share करे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस औषधीय पौधे के बारे में जानकर इसका लाभ उठा सके|







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